अमेरिका में गिरी साफ्ट ड्रिंक की मांग.

March 13, 2008

soft-drinks.jpgअमरीका में उपभोक्ताओं का रुझान चाय और बोतल बंद पानी की तरफ बढने से पिछले तीन साल से साफ्ट ड्रिंक की मांग लगातार घट रही है. देश में साफ्ट ड्रिंक कारोबार पर नजर वाली ब्रेवरेज डाइजेस्ट की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक लोगो का रुझान चाय और बोतल बंद पानी की ओर बढ रहा है. इससे साफ्ट ड्रिंक की मांग निरंतर कम हो रही है.

रिपोर्ट में दिए गए आंकडों के अनुसार वर्ष 2007 में साफ्टड्रिंक की मांग 2.3 प्रतिशत घटकर 9.92 अरब पेटियां रह गयी. वर्ष 2005 और 2006 में मांग क्रमश 0.2 तथा 0.6 प्रतिशत घटी थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि 1990 के दशक में देश में साफ्ट ड्रिंक उद्योग तीन प्रतिशत की दर से बढ रहा था जबकि पिछले तीन वषो से यह लगातार घट रहा है. साफ्ट ड्रिंक की बजाय लोगों को बोतल बंद पानी और तैयार चाय की चुस्की में अधिक स्वाद आ रहा है.

रिपोर्ट के प्रकाशक जान सीचर ने कहा प्रारंभिक तौर पर उपभोक्ता की रूचि चाय और बोतल बंद पानी की तरफ बढी है और उन्होंने इसे अपना लिया है. इसके अलावा पिछले कुछ वषो से साफ्ट ड्रिंक की कीमतों में बढोतरी ने भी मांग को प्रभावित किया है.

मांग घटने के बावजूद साफ्ट ड्रिंक कारोबार से होने वाली आय में वृद्धि हुई है. आय 2.7 प्रतिशत बढकर 72 अरब डालर पर पहुंच गई. आय में बढोतरी मुख्यत शक्तिवर्द्धक और परंपरागत साफ्टड्रिंक की कीमतों में बढोतरी के परिणामस्वप हुई.
Source: Oneindia

किसकी मानें ?

March 12, 2008

सभी लोगों की अपनी-अपनी सोच होती है। कुछ लोग अपनी सोच को कागज़ पर उड़ेल देते हैं और किताब के रूप मे संग्रहित भी कर लेते हैं जो कि सदियों तक इंसानों की बुद्दि पर राज करती है। कुछ लोग अन्य माध्यमों से अपने विचार बड़े अच्छे ढंग से दूसरों तक प्रेषित करने मे सक्षम होते हैं। और विशेष तौर पर मेरे देश के लोग भेड़-बकरियों की भांति इनके पीछे चल देते हैं। क्या कभी हमने गौर फ़रमाया कि इतने अच्छे विचारों वाले यें लोग खुद उन बातों पर कितना अमल करते हैं?पिछले दिनों मेरे एक दोस्त के दोस्त ने पूछा कि आप किस दार्शनिक की सोच से प्रभावित हैं ; तो मै चकरा गया, क्योंकि मै तो गांव के एक आंखों से अंधे बुजुर्ग की सोचनी से प्रभावित था, कॉलेज टाईम के एक प्रोफेसर से, अपने बारबर से, अपने दोस्त डॉo मुनीश से, गांधी जी से बेहद प्रभावित हूं और अटल जी भी प्रभावित करते हैं। जबकि विलिअम वोर्ड्सवोर्थ और रजनीश ओशो से मै इत्तफाक नही करता। वो रजनीश जो दूसरों को बन्धन मुक्त रहने की सलाह देते हैं और खुद बौद्ध से बंधे हैं तथा दुसरे लोगों को अपने साथ बाँधने की कोशिश करते हैं।मै सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, अकबर खान से यानि अपने आप से, जिस सोच के तहत रहकर मै अपनी ज़िम्मेदारियाँ बड़ी आसानी से निभा सकता हूं। मै सोचता हूं कि बड़ी-बड़ी बातें बनाने या सुनने की बजाय हमे अपने मन की बात ईमानदारी से सुननी चाहिए, उस पर अमल करना चाहिए। हम स्वयं के सर्वोत्तम दोस्त हों और लाइफ को प्रक्टिकली जीयें तभी हम अपना और अपने राष्ट्र का सही मायनों मे विकास कर पाएंगे। क्या आप मेरी सोच से सहमत हैं? अगर हैं तो अच्छी बात है और अगर नहीं, तो भी अच्छी बात; अपने मन की अच्छी बात सुनिए और अमल कीजिए। शुभ कामनाएं !!!